मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में इन दिनों गंदे और दूषित पानी की सप्लाई को लेकर भारी हड़कंप मचा हुआ है। शहर के कई इलाकों में कथित तौर पर जहरीला पानी सप्लाई किए जाने के बाद अब तक 17 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से बीमार बताए जा रहे हैं। इस घटना ने न सिर्फ आम जनता को दहशत में डाल दिया है, बल्कि नगर निगम, जल आपूर्ति विभाग और स्वास्थ्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैसे सामने आया मामला
स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों से कई कॉलोनियों में नलों से बदबूदार, मटमैला और रंग बदला हुआ पानी आ रहा था। शुरुआत में लोगों ने इसे अस्थायी समस्या मानकर नजरअंदाज किया, लेकिन जब पेट दर्द, उल्टी, दस्त और बुखार जैसी शिकायतें तेजी से बढ़ने लगीं, तब मामला गंभीर होता चला गया।
अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ने लगी। सरकारी और निजी अस्पतालों के वार्ड भर गए और कई मरीजों को ड्रिप व अन्य उपचार की जरूरत पड़ी। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, अधिकतर मरीजों में पानी से फैलने वाली बीमारियों के लक्षण पाए गए।
17 मौतों से मचा हड़कंप
स्थिति उस समय और भयावह हो गई जब अलग-अलग इलाकों से मौतों की खबरें आने लगीं। अब तक 17 लोगों की मौत की पुष्टि होने की बात कही जा रही है। मृतकों में बुजुर्गों के साथ-साथ कुछ युवा और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग भी शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि प्रशासन का कहना है कि सभी मौतों का सीधा कारण दूषित पानी ही है या नहीं, इसकी जांच की जा रही है।
फिर भी स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर समय रहते पानी की जांच और सप्लाई बंद करने का फैसला लिया जाता, तो इतने बड़े स्तर पर जनहानि नहीं होती।
जहरीला पानी कहां से आया?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह दूषित पानी आया कहां से। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि पानी की पाइपलाइन में सीवेज का पानी मिल गया था। कुछ इलाकों में पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों के कारण लीकेज की समस्या पहले से ही मौजूद थी।
स्थानीय नागरिकों का दावा है कि उन्होंने कई बार नगर निगम को शिकायत दी थी, लेकिन उन शिकायतों पर या तो कोई कार्रवाई नहीं हुई या फिर केवल औपचारिक निरीक्षण कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका को लेकर जनता में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जब शुरुआती शिकायतें सामने आई थीं, तब अगर पानी की सप्लाई को अस्थायी रूप से रोका जाता और वैकल्पिक व्यवस्था की जाती, तो हालात इतने गंभीर नहीं होते।
आरोप यह भी है कि जल गुणवत्ता की नियमित जांच या तो हुई ही नहीं या फिर रिपोर्ट को नजरअंदाज किया गया। कई लोगों ने सवाल उठाया है कि स्मार्ट सिटी कहे जाने वाले इंदौर में बुनियादी सुविधा जैसे साफ पानी की व्यवस्था इतनी लापरवाह कैसे हो सकती है।
स्थानीय लोगों का गुस्सा
प्रभावित इलाकों में लोगों ने प्रदर्शन भी किए हैं। सड़कों पर उतरकर नागरिकों ने नगर निगम और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो, पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाए और शहर की पूरी जल आपूर्ति प्रणाली की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
कई परिवारों का कहना है कि उनके घरों में अब भी डर का माहौल है और लोग नल का पानी पीने से कतरा रहे हैं। लोग मजबूरी में बोतलबंद पानी खरीद रहे हैं, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट और कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित इलाकों से पानी के सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट में पानी में हानिकारक बैक्टीरिया पाए जाने की बात सामने आई है। विभाग ने लोगों को उबला हुआ पानी पीने और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है।
इसके अलावा, नगर निगम द्वारा कुछ इलाकों में टैंकरों से साफ पानी सप्लाई करने की व्यवस्था की गई है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि यह व्यवस्था नाकाफी है और सभी जरूरतमंदों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है।
आगे क्या?
अब इस पूरे मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं और कहा जा रहा है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का दावा है कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए पाइपलाइनों की मरम्मत, नियमित जल परीक्षण और निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जाएगा।
लेकिन सवाल यही है कि क्या यह कदम समय रहते उठाए गए होते, तो क्या 17 लोगों की जान बच सकती थी?
इंदौर में दूषित पानी की सप्लाई की यह घटना सिर्फ एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और व्यवस्था की कमजोरी का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत पर यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं, यह मामला साफ तौर पर दिखाता है।
अब देखना यह होगा कि जांच के बाद सच सामने आता है या नहीं, और क्या जिम्मेदार लोगों पर वास्तव में कार्रवाई होती है, या यह मामला भी धीरे-धीरे फाइलों में दबकर रह जाएगा।





